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Judiciary

जब शादी सिर्फ नाम की रह जाए, तब क्या होता है? हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

By Kshipra Srivastava      29 June, 2026 05:00 PM      0 Comments
जब शादी सिर्फ नाम की रह जाए तब क्या होता है हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने एक ऐसे वैवाहिक विवाद में अहम फैसला सुनाया है, जिसमें पति-पत्नी करीब 36 साल से अलग रह रहे थे। अदालत ने कहा कि जब पति-पत्नी के बीच इतने लंबे समय से कोई वैवाहिक संबंध नहीं बचा है और साथ रहने की कोई संभावना भी नहीं है, तो ऐसे रिश्ते को सिर्फ कागजों पर जिंदा रखने का कोई मतलब नहीं है। कोर्ट ने इसे "डेड वुड मैरिज" (Dead Wood Marriage) यानी ऐसा विवाह बताया, जिसमें अब जीवन या साथ रहने की कोई संभावना नहीं बची।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन पत्नी को मिलने वाली स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) की राशि10 लाख रुपये से बढ़ाकर 40 लाख रुपये कर दी।

क्या था मामला?

यह मामला संध्या देवी बनाम राजेश कुमार सिंह का है। पति-पत्नी की शादी करीब चार दशक पहले हुई थी। शादी के कुछ समय बाद दोनों के रिश्तों में खटास आ गई और दोनों अलग रहने लगे। रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों करीब 36 वर्षों से साथ नहीं रह रहे थे।

पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की। उसका कहना था कि इतने लंबे समय से अलग रहने के कारण अब इस रिश्ते को बचाने की कोई संभावना नहीं है। दूसरी ओर पत्नी ने तलाक का विरोध किया और कहा कि शादी खत्म नहीं की जानी चाहिए।

फैमिली कोर्ट ने पति की दलील स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री दे दी और पत्नी को10 लाख रुपये एकमुश्त गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। इसके बाद पत्नी ने इस फैसले को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने किन बातों पर विचार किया?

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और संजय प्रसाद की खंडपीठ ने मामले के सभी दस्तावेज, गवाहों के बयान और दोनों पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया।

अदालत ने पाया कि पति-पत्नी पिछले 36 वर्षों से अलग रह रहे हैं। इतने लंबे समय तक अलग रहने के दौरान दोनों के बीच वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू करने की कोई कोशिश सफल नहीं हुई। अदालत ने कहा कि इतने लंबे अलगाव से साफ है कि पति-पत्नी का रिश्ता पूरी तरह खत्म हो चुका है और अब साथ रहने की संभावना लगभग नहीं है।

'डेड वुड मैरिज' का क्या मतलब है?

अदालत ने अपने फैसले में "Dead Wood Marriage"शब्द का इस्तेमाल किया।

सरल भाषा में इसका मतलब है कि ऐसा विवाह जो केवल कानूनी रिकॉर्ड में मौजूद हो, लेकिन वास्तविक जीवन में उसका कोई अस्तित्व न बचा हो। यानी पति-पत्नी वर्षों से अलग हों, उनके बीच पति-पत्नी जैसा कोई रिश्ता न हो और भविष्य में भी साथ रहने की उम्मीद खत्म हो चुकी हो।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे रिश्ते को केवल कानूनी रूप से बनाए रखना किसी भी पक्ष के हित में नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि शीर्ष अदालत पहले भी कह चुकी है कि यदि पति-पत्नी बहुत लंबे समय से अलग रह रहे हों और विवाह पूरी तरह टूट चुका हो, तो अदालत को केवल औपचारिक रूप से विवाह को जारी रखने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य ऐसे रिश्ते को जबरन बनाए रखना नहीं है, जिसमें साथ रहने की कोई वास्तविक संभावना ही न बची हो।

फिर 40 लाख रुपये क्यों दिए गए?

हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट ने पत्नी के लिए 10 लाख रुपये की जो राशि तय की थी, वह पर्याप्त नहीं थी।

अदालत ने पति की आर्थिक स्थिति, पत्नी की उम्र, भविष्य की जरूरतों, महंगाई और लंबे समय तक चले वैवाहिक संबंध को ध्यान में रखा। कोर्ट ने कहा कि पत्नी को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए पर्याप्त आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने स्थायी गुजारा भत्ता बढ़ाकर40 लाख रुपये कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक होने के बाद भी आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष के भविष्य की सुरक्षा करना कानून की जिम्मेदारी है।

क्या हर लंबे अलगाव में तलाक मिल जाएगा?

नहीं।

हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि केवल लंबे समय तक अलग रहने से हर मामले में तलाक मिल जाएगा। अदालत हर मामले के तथ्य अलग-अलग देखती है। लेकिन यदि यह साबित हो जाए कि पति-पत्नी का रिश्ता पूरी तरह खत्म हो चुका है, दोनों वर्षों से अलग रह रहे हैं और दोबारा साथ रहने की कोई संभावना नहीं है, तो अदालत इसे महत्वपूर्ण परिस्थिति मान सकती है।

इस फैसले का क्या महत्व है?

यह फैसला बताता है कि अदालतें केवल कानूनी तकनीकी पहलुओं पर नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों पर भी ध्यान देती हैं।

यदि विवाह केवल कागजों तक सीमित रह गया हो और पति-पत्नी दशकों से अलग जीवन जी रहे हों, तो अदालत ऐसे रिश्ते को खत्म करने का आदेश दे सकती है। साथ ही, अदालत यह भी सुनिश्चित करती है कि तलाक के बाद आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को उचित आर्थिक सहायता मिले।

यही वजह है कि झारखंड हाईकोर्ट ने एक ओर तलाक का फैसला बरकरार रखा, वहीं दूसरी ओर पत्नी के हितों की रक्षा करते हुए गुजारा भत्ता बढ़ाकर40 लाख रुपये कर दिया।

मामला: Sandhya Devi v. Rajesh Kumar Singh
केस नंबर: First Appeal No. 126 of 2022
न्यायालय: झारखंड हाईकोर्ट, रांची
पीठ: जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद एवं जस्टिस संजय प्रसाद
निर्णय: तलाक बरकरार, पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता।



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